यूपी का रण : करवट बदलती मुस्लिम सियासत, अब सिर्फ धर्म गुरुओं के कहने पर नहीं चलता आम मुसलमान,

Aftab Khan ××××××× Human Rights Media Council AMMP 24 News: Date: Mon, 20 Dec 2021 04:15 AM

मुस्लिम मतदाताओं को राजनीतिक पार्टियां संगठित वोटबैंक मानती हैं. AMMP 24 News

आपको बता दें, उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव सिर पर है। चुनाव हो और मुसलमानों की याद न आए, यह मुमकिन नहीं। अब तक के रुझान से ऐसा लगता है कि वे राजनीति के केंद्र में फिर से आने वाले हैं। कैसे आएंगे या आ रहे हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि राजनीतिक पार्टियां उन्हें किस तरह के नागरिक के तौर पर देख रही हैं। सबसे दिलचस्प है, जिन्हें लगता है कि उनका वोट नहीं चाहिए और जो उम्मीद में हैं, दोनों के लिए मुसलमान बड़े काम की चीज हैं। जिन्हें उनका वोट नहीं चाहिए, वे मुसलमानों से जुड़े हर मामले पर सीधे या इशारे में खुलकर बोल रहे हैं। जिन्हें उनका वोट चाहिए, वे बहुत ही नपे-तुले अंदाज में ‘मुसलमान’ बोल रहे हैं।…और मुसलमान कशमकश में हैं। लगता है जैसे उनके खाने-पीने, हंसने-बोलने, उठने-बैठने, चलने, पहनने-ओढ़ने, इबादत करने, सब पर वोटों के लिए नजर है।

बताते चलें कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुसलमानों की अहमियत की पुख्ता वजहें हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, प्रदेश की आबादी में मुसलमानों की तादाद 3 करोड़ 84 लाख 83 हजार 967 यानी लगभग 19.26 फीसदी है। ऐसा कहा जा सकता है कि राज्य का हर पांचवां शख्स मुसलमान है। अगर समूह के तौर पर देखें तो ये बड़ी आबादी है। कहीं कम, कहीं ज्यादा, यह पूरे प्रदेश में हैं। हालांकि, इनकी आबादी का बड़ा हिस्सा पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश, रूहेलखंड, तराई और अवध क्षेत्र में रहता है।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) के मुताबिक, 144 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जिनमें मुसलमान वोटरों की संख्या बाकी इलाकों के बनिस्बत ज्यादा है। 74 विधानसभा क्षेत्रों में तो 30 फीसदी मतदाता मुसलमान हैं। 70 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता के तौर पर इनकी संख्या 20 से 29 फीसदी के बीच है। यानी वे इन इलाकों में चुनाव का रुख तय कर सकते हैं। इन आंकड़ों से तो यही लगता है कि वे विधानसभा में भी इतने ही असरदार संख्या में पहुंचते होंगे। इनकी राजनीतिक हैसियत और हिस्सेदारी बहुत ही जबरदस्त होगी!

राजनीति में हिस्सेदारी
हकीकत है, सन 2017 के विधानसभा चुनाव में विधायक के तौर पर सिर्फ  24 मुसलमान चुने गए। बाद में यह संख्या 25 हो गई। यानी 403 सदस्यों की विधानसभा में सदस्यों के तौर पर मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 6.2 फीसदी ही है। 

यही नहीं, सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली पार्टी का एक भी उम्मीदवार मुसलमान नहीं था।पिछले तीन दशकों के चुनाव नतीजे बताते हैं कि विधानसभा में मुसलमानों की हिस्सेदारी का रिश्ता भारतीय जनता पार्टी के उभार से भी है। जब भी भारतीय जनता पार्टी की सीटें दूसरे दलों के मुकाबले काफी ज्यादा रहीं, मुसलमानों की हिस्सेदारी कम हुई। इस लिहाज से देखा जाए तो 1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबरदस्त जीत के बाद मुसलमानों की हिस्सेदारी में काफी कमी आई थी। इस चुनाव में भाजपा ने अपने बल पर सरकार बनाई थी।

हालांकि, इसके बाद हुए चुनाव के जैसे नतीजे आए, उसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती रही। 2012 में यह हिस्सेदारी लगभग 17.12 फीसदी पहुंच गई। यानी जितनी आबादी, लगभग उतनी ही हिस्सेदारी। अब इसकी तुलना 2017 के चुनाव नतीजों से करें तो पता चलता है कि उनकी हिस्सेदारी लगभग 11 फीसदी कम हो गई। प्रदेश की आबादी में इनकी हिस्सेदारी, विधानसभा क्षेत्रों में इनकी मजबूत पकड़ की तुलना में जब हम 2017 के इस आंकड़े को देखते हैं तो वे राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर या बेअसर नजर आते हैं। बल्कि हाशिए पर टिका दिए गए दिखते हैं।

अब सवाल है कि 2022 के चुनाव में मुसलमानों का क्या होगा? या उनका वोट किधर जाएगा? जिस तरह मुसलमानों की जिंदगी मिथकों, भ्रांतियों और खांचे में कैद कर दी गई है, उसी तरह उनकी राजनीतिक भागीदारी को भी खास चश्मे से देखा जाता है। 

जैसे-मुसलमान एक वोट बैंक हैं। वे एकमुश्त एक ही पार्टी को वोट करते ही हैं। यही नहीं, वे वोट अपने मजहबी रहनुमाओं के कहने पर करते हैं। यानी वे भेड़ चाल चलते हैं। मुसलमानों को देखने का ऐसा नजरिया भी उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी में बड़ी बाधा बना है। इसकी वजह से आम लोगों का बड़ा तबका और कुछ पार्टियां, उन्हें किसी खास के साथ और किसी खास के विरोध में देखती हैं। वे उन्हें बतौर नागरिक देखने के बजाय धार्मिक खांचे में कैद करके ही देखते हैं। सीएसडीएस चुनाव बाद सर्वेक्षण करता है। इसमें वह यह भी पता करने की कोशिश करता है कि किस सामाजिक समूह ने किसे वोट दिया है। 

मुसलमान क्या करेंगे?
इस चुनाव में मुसलमानों के पास क्या विकल्प है? अभी यह कहना मुश्किल है। मगर पिछले रुझान अगर कुछ बता रहे हैं तो उससे साफ पता चल रहा है कि उनके वोट किस-किस को जा सकते हैं। यानी मुसलमानों का बड़ा हिस्सा सपा की तरफ जाता है, लेकिन एक हिस्सा भाजपा को भी वोट देता है। इसी तरह सीएसडीएस का चुनाव बाद सर्वेक्षण यह भी बताता है कि मुसलमानों की बड़ी तादाद किसी धर्मगुरु के कहने पर वोट नहीं देता है। यानी मुसलमान नागरिक भी वैसे ही अपनी पसंद तय करते हैं, जैसे दूसरे तय करते हैं।

लोकतंत्र में हिस्सेदारी की अहमियत
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सबकी मजबूत हिस्सेदारी, लोकतंत्र के लहलहाते होने की पहचान है। अगर समाज के किसी समूह की वाजिब हिस्सेदारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नहीं होती है, तो वह उस समूह को बाद में नुकसान पहुंचाएगा, पहले वह लोकतंत्र को ही कमजोर करेगा। इसलिए मुसलमानों की हिस्सेदारी के बारे में उनको नहीं, बल्कि पार्टियों को सोचना है। मुसलमानों की हिस्सेदारी घटने का मतलब है, कुछ पार्टियों की हैसियत और हिस्सेदारी का बेहद कम हो जाना। खासकर, सपा, बसपा, कांग्रेस- इन पार्टियों और इनके समर्थकों को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए बेहतर है। वैसे, सोचना तो भाजपा को भी है। अगर मुसलमानों का एक ठीक-ठाक वोट लगातार उसे मिल रहा है, तो उन्हें राजनीतिक हिस्सेदारी भी मिले। मगर, क्या लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का नागरिकों के साथ रिश्ता महज वोट का है?
 
खास मुद्दे
मुसलमानों की जरूरतें भी वैसी ही हैं, जैसी किसी और की। जिन चीजों से उनकी पहचान जुड़ती नजर आती है, वे उन्हें खत्म होती नजर आती हैं। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन जब बार-बार उनकी पहचान को मध्यकाल में घसीट कर जोड़ दिया जाता है तो उनका अपने मौजूदा वजूद और भविष्य के लिए परेशान होना लाजिमी है। 

कोविड से पहले नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन इसी का नतीजा था। इस माहौल में उनकी हालत बाकी नागरिकों से अलग हो जाती है। सहमा नागरिक, समान नागरिक नहीं हो सकता है। इसलिए उनके लिए इस चुनाव में दाल-रोटी के अलावा बेखौफ जिंदगी भी बड़ा मुद्दा हो सकता है। सबका साथ, सबका विकास हो, इसके लिए सबसे जरूरी है, सबका भरोसा। यह काम नीचे से नहीं, ऊपर से ही हो सकता है। इसमें सभी पार्टियों को अपने-अपने हिस्से की भूमिका अदा करनी होगी। अगर ऐसा होता है, तब ही हम यूपी में सच्चे लोकतंत्र और विकास की मजबूत बुनियाद रख सकते हैं। अब देखना तो यह है कि सभी पार्टियां आजादी के अमृत वर्ष में मुसलमानों के साथ क्या सुलूक करती हैं? उन्हें वोट के लिए पक्ष और विपक्ष में इस्तेमाल करेंगी या साझीदार और हिस्सेदार बनाएंगी।
मुस्लिम नेताओं व धर्मगुरुओं के बयान
सांप्रदायिकता फैलाकर अपनी रोटियां सेंकने वाले संविधान के खिलाफ
मुल्क में मुस्लिमों के हालात बदलने के लिए शिक्षा बेहतर से बेहतर की जाए। मुसलमान इस देश का हिस्सा है। हमने देश को बाई चांस नहीं, बाई च्वॉइस चुना है। यहां की मिट्टी से हमारा ताल्लुक हैै। मजहबवाद फैलाकर जो अपनी रोटियां सेकना चाहते हैं, वे संविधान के खिलाफ  हैं। सरकार के जिम्मेदार मुस्लिम को छोड़कर अन्य धर्म के लोगों को देश की नागरिकता देने की बात करते हैं। जबकि मुस्लिमों को सुबूत न देने पर घुसपैठिया करार देकर देश से बाहर निकालने की बात करते हैं, यह गलत है। देश के कानून के हिसाब से जो हिंदुस्तानी है, हिंदुस्तानी रहे। आज मुद्दा है गुरबत का, बेरोजगारी का…।  इन सब पर हुकूमत को सोचना चाहिए। सियासत तो देश की तरक्की के नाम पर होनी चाहिए।    -मौलाना मो. यामीन कासमी, प्रवक्ता, देवबंद दारुल उलूम

सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई-बेरोजगारी
देश व प्रदेश की जनता के सामने फिलहाल सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई, बेरोजगारी का है। बुनियादी चीजें लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। पेट्रोल, रसोई गैस से लेकर खाने की सभी वस्तुओं के दाम लगातार आसमान छू रहे हैं। लोगों की नौकरिया जा रही हैं। कारोबार चौपट हो गए हैं। आम लोगों का जीना मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य भी अहम मुद्दा है। कोरोना की तीसरी लहर भी आने की आशंका बढ़ रही है।  प्रदेश की जनता इन सभी मुद्दों को ध्यान में रख कर इस बार मतदान करेगी। मेरी लोगों से अपील है कि समाज के लिए बेहतर काम करने वाले उम्मीदवारों को वोट देकर एक बेहतर सरकार बनाएं। -मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली, अध्यक्ष, इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया

ध्रुवीकरण की कोशिशें नहीं होंगी कामयाब
सियासी लोग धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जनता होशियार है। नोटबंदी और जीएसटी ने लोगों के कारोबार को काफी नुकसान पहुंचाया था। कोरोना काल में बड़ी तादात में लोग बेरोजगार हुए हैं। किसी ने सोचा भी नही होगा कि सरसों का तेल 200 रुपये के ऊपर बिकेगा, पेट्रोल 100 रुपये के पार हो जाएगा। यहां तक कि रसोई गैस एक हजार रुपये तक पहुंच जाएगी। महंगाई की मार से कोई एक मजहब के मानने वाले ही परेशान नहीं हैं, बल्कि सभी हैं। इस बार मंदिर, मस्जिद, श्मशान और कब्रिस्तान के नाम पर लोग वोट नही करेंगे। जनता अभी कुछ बोल नहीं रही है। जनता की खामोशी चुनाव में वोट की चोट करेगी। – मौलाना सैफ अब्बास, अध्यक्ष, शिया चांद कमेटी

अभी मुसलमानों का कोई फैसला नहीं
 भाजपा ‘सबका साथ सब का विश्वास’ का नारा लेकर सत्ता में आई थी। पर, जमीनी हकीकत यह है कि एक बड़े वर्ग का वोट मुट्ठी में रखने के लिए मुसलमानों के साथ वह हमदर्दी नहीं दिखाती। कथित तौर पर कई सेक्युलर पार्टियां भी हैं जिन्हें मुसलमानों का वोट तो चाहिए, लेकिन उनकी बुनियादी समस्याओं पर मौन साध लेती हैं। उन्हें भी डर रहता है कि मुसलमानों की समस्याओं का समाधान होने से उनका बड़े वर्ग का वोट न दूर हो जाए। दंगों की मार सबसे ज्यादा मुसलमानों ने झेली। पीड़ित मुसलमान होता है, आरोपी भी उसे ही बनाया जाता है। इसके लिए दंगा आयोग गठित किए जाने की जरूरत हैे। मुसलमानों को आरक्षण देने की बात आती है तो कहा जाता है कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। हिंदू दलित को जब आरक्षण दिया जा सकता है तो मुस्लिम समाज के दलित को क्यों नहीं?  जहां तक बात चुनावों की है, अभी मुस्लिम वेट एंड वॉच वाली स्थिति में है। -मौलाना तौकीर रजा, अध्यक्ष, ऑल इंडिया इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल

सियासी नुमाइंदे
प्रदेश की सियासत में कई मुस्लिम नेताओं ने अहम मुकाम हासिल किया। समय-समय पर मुसलमानों के पक्ष में आवाज बुलंद की। आजम खां,  अहमद हसन, नसीमुद्दीन सिद्दीकी सरीखे कई कद्दावर नेताओं ने  सियासत में मुकाम हासिल किया। आजम खां अपने सख्त तेवरों और विधायी कामों की पुख्ता जानकारी के लिए जाने जाते हैं, हालांकि, कई बार अपनी छवि के कारण वे विवादों में भी रहे। 
 
आजम खां : रामपुर से सपा के सांसद आजम खां यूपी में बड़ा मुस्लिम चेहरा माने जाते हैं। 9 बार विधायक रह चुके हैं। वर्ष 1996-2002 के बीच राज्यसभा सांसद भी रहे। अखिलेश सरकार में नगर विकास समेत कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। सदन के अंदर और बाहर अपने बयानों   के लिए सदैव चर्चा में रहे। फिलहाल करीब दो साल से   जेल में हैं।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी : कभी बसपा का प्रमुख मुस्लिम चेहरा रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब कांग्रेस में हैं। बसपा सरकार में उनका बड़ा रसूख था।
अहमद हसन : विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष और सपा नेता अहमद हसन अपनी शाइस्तगी (विनम्रता) के लिए पहचाने जाते हैं। पुलिस अफ सर रहे अहमद हसन अखिलेश सरकार में शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के कैबिनेट मंत्री भी रहे।
मोहसिन रजा : योगी सरकार में अल्पसंख्यक, वक्फ और हज राज्यमंत्री मोहसिन रजा 1996 में भाजपा से जुड़े। 2017 में भाजपा की सरकार बनने पर उन्हें एमएलसी बनाया गया।
याकूब कुरैशी : मुस्लिम नेताओं में याकूब कुरैशी का विवादों से गहरा नाता रहा है। वह 2007 में यूपीयूडीएफ के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीते। लेकिन बाद में बसपा में शामिल हो गए। उन्हें बसपा सरकार में राज्यमंत्री भी बनाया गया।
 
। आर्थिक रूप से पिछड़ा मुसलमान मतदाता अपने आप को ठगा महसूस करता है बाध्यता से दूर तो हो गया, लेकिन अब भी वह सही रहबर की तलाश में है।
इसके खालीपन का लाभ उठाने के लिए समाज के ‘दलालों’ का फोकस हावी हो गया। यह छोटे स्तर पर इन मतदाताओं के मतों का सौदा करने लगा। पिछले दो-तीन चुनावों में इसका बोलबाला दिखा। बहरहाल, नए बदलाव ने चेतना पैदा की है, जिससे लोगों में कशमकश है। वह अपने समाज के बाहर भी राहबर की तलाश में है। यही वजह रही कि उसने सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को अपनाया और वह मुल्ला मुलायम सिंह कहलाने लगे, तो कभी मायावती की तरफ उसने हसरत भरी निगाहों से देखा। भाजपा को हराने वाले प्रत्याशी को वोट देने की सोच में भी अब हल्का सा बदलाव दिख रहा है। तालीम, सेहत और दूसरी बुनियादी सुविधाएं जो देगा, मुस्लिम वोटर उसी राहबर से अपनी उम्मीदें वाबस्ता कर सकता है।
 
तीन तलाक कानून का अंडर करंट चल रहा है। महिलाओं को सुरक्षा का आभास हो रहा है।  पुलिस सीधे कार्रवाई करने लगी है, जिससे लोग डरने भी लगे हैं। बहरहाल, कानून का समर्थन करने वाले लोग चुप हैं। जाहिर तौर पर महिलाओं में इसकी प्रतिक्रिया नहीं दिखती, लेकिन अंदरखाने इसका व्यापक असर महसूस हो रहा है।

तालीम से आएगा सोच में बदलाव
बदलाव के सवाल पर ऑल इंडिया सुन्नी उलमा काउंसिल के महासचिव हाजी मोहम्मद सलीस कहते हैं, मुस्लिमों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना आई है। सोच में बदलाव दिख रहा है। अब मुस्लिम उम्मीद करते हैं कि उनके मदरसों का आधुनिकीकरण कर आधुनिक शिक्षा दी जाए। वहीं, कानपुर के शिया शहर काजी मौलाना अली अब्बास खां नजफी और कानपुर के शहर काजी मौलाना मुश्ताक अहमद मुशाहिदी भी सोच में बदलाव के लिए तालीम को जरूरी बताते हैं। 
 
मुस्लिम महिलाओं की स्थिति पर कानपुर की महिला शहर काजी और ऑल इंडिया मुस्लिम ख्वातीन बोर्ड की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. हिना जहीर कहती हैं, यकीनन काफी बदलाव आया है। जागरूकता आने से मुस्लिम महिलाओं का मतदान प्रतिशत 11 से बढ़कर 35 हुआ है। सियासी चेतना आने से पहले की तरह अब वे परिवार के दबाव में आकर नहीं, बल्कि खुद तय करती हैं कि किसे वोट देना है। वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर महिला सशक्तीकरण के लिए कार्य करने वाली सरकार चाहती हैं। ऐसी सरकार, जो उनके हितों की रक्षा करे। यही वजह है कि आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े मोहल्लों की बेटियां चार्टर्ड अकाउंटेंट बन रही हैं। मेडिकल की शिक्षा ले रही हैं। विभिन्न विभागों में ऊंचे पदों पर जा रही हैं।au

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